Tuesday, March 25, 2008

जब भी मैं तुम्हे सोचता हूँ..


आकर्षण की सीमा से परे..

जब भी मैं तुम्हे सोचता हूँ..

तो तुम मुझे दिखाई देती हो

उस चाँदनी raat की तरह
जो अँधेरा चिर कर निकला हो॥
विचारो की सीमा से परे..
जब भी मैं तुम्हे सोचता हूँ..
तो तुम मुझे दिखाई देती हो
उस प्यार भरे लम्हे की तरह
जिसे जीने की खातिर
यह उम्र भी कम पड़ जाए
स्वप्न की सीमा से परे॥
जब भी मैं तुम्हे सोचता हूँ॥
तो तुम मुझे दिखाई देती हों
मेरी जीवन की तपती भूमि पर
कुछ भीनी फुहारे बरसा कर
मेरी जीवन की मिटटी को
सोंधी कर देती हों ॥
यथार्थ की सीमा से परे
जब भी मैं तुम्हे सोचता हूँ॥
तो तुम मुझे दिखाई देती हों
आकर्षण से, विचारो से, सपनो से
बहुत कुछ करीब होता है ...
अगर कुछ नही होता है तो ...
वो तुम.....?

Sunday, March 23, 2008

tumhe bhool jaaoun

तुम्हे भूल जाऊ .........
हरिहरन की आवाज ....
दर्द का रिश्ता ....