
दोस्तो,
जीवन मे कई रिश्ते बनते- बिगडते, उलझते-सुलझते रहते हैं। पारिवारिक, कार्यक्षेत्र, दोस्ती और मानवीय संवेदनाओं के। हमारे समाज मे भी हर तरह के रिश्ते का अपना एक विशेष महत्व है. लेकिन अब धीरे-धीरे सब कुछ बदल रहा है
उड़ीसा के एक मेरे अजीज दोस्त की भावनाओ से आज रूबरू हुआ..उसकी बातो के कुछ अन्सो ने मुझे कुछ लिखने को मजबूर किया. मुझे लगता है की वो दोस्त भी कुछ रिश्तो की उलझन मे है, मुझे लगता है आज के बदलते दौर मे जिस रिश्ते मे सबसे ज्यादा बदलाव आया है वो सम्भवत: पति-पत्नी का है॥ समर्पण और त्याग की जगह अब दम्भ और स्वार्थ दिखाई देता है…लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है की सामाजिक रिश्ते की प्रतिबद्दाता होती है.. परेशानी तब उठती है जब रिश्तों के मूल मे प्रेम ही नही होता..जहा प्रेम ही नही, वहा रिश्तों का क्या मोल?? फ़िर ऐसे रिश्ते क्यो निभाए जाते है? ऐसे रिश्तों को तोड़ देना ......
रिश्तों की कैसी उलझन है,
शर्तों पर होते बन्धन हैं!
अब बन्ध जाने का मोह नही,
बस खुल जाने की तडपन है!!
आज जो दिल को प्यारा है,
कल बेकार बेचारा है,
कभी इस पर तो कभी दूजे पर,
घटती बढती अब धडकन है!
रिश्तों की कैसी उलझन है
इक जागे दूजा सो जाए,
ना पूछे कुछ, ना बतियाए,
दूजे की चिन्ता करे कौन!
पल- पल होती अब अनबन है!
...क्रमशः