
मैंने कामना नहीं की
निरंतर सुख की
मैं जानता हूं
यह सहज नहीं
कल्पना की उड़ानें
नहीं भरी मैंने
क्योंकि यथार्थ यही है
की उड़ने के बाद भी
इसी जमीन पर उतरना है
मैंने कोई सपना नहीं देखा
क्योंकि सपने सच नहीं होते
वे तो अंधेरे के उस मोती के समान है
जो सुबह होते ही फूट जाते हैं...
यूं सपने में होना भी
सुख है.. मैं जानता हूं ...
क्या आप जानते है.....?
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