Wednesday, October 22, 2008
Wednesday, August 27, 2008
Saturday, May 3, 2008
बेबस परिंदा हूँ ....

जानता हूँ की मैं
पा नहीं सकता तुम्हें,
यहाँ तक की तुम्हें छू पाना भी
असंभव है मेरे लिए।
फिर भी तुम्हारा अस्तित्व रहने तक
यहीं बने रहना है मुझे
हल्की बारिश के बाद
नोकीले पत्ते के कोने पर
बूँद सी, दमक रही हो तुम
जैसे तुम भी हिस्सा हो,
एक मात्र उस चौन्धियाते सूरज का।
कई बार चाहा की छू लूं तुम्हें,
या चोंच में भर ज्यों-का-त्यों
तुम्हें घोंसले तक ले आऊं।
परन्तु, मैं तो उसी पत्ते की शाख पर
निश्छल बैठा एक बेबस परिंदा हूँ
बस, एकटक निहार भर सकता हूँ तुम्हें,
वो भी दूर से,
ज़रा भी तुम्हारी ओर बढा तो
मेरा अस्तित्व बिखेर कर रख देगा तुम्हें।
Tuesday, April 29, 2008
...और मैंने नींद खरीदी
Tuesday, March 25, 2008
जब भी मैं तुम्हे सोचता हूँ..

आकर्षण की सीमा से परे..
जब भी मैं तुम्हे सोचता हूँ..
तो तुम मुझे दिखाई देती हो
उस चाँदनी raat की तरह
जो अँधेरा चिर कर निकला हो॥
विचारो की सीमा से परे..
जब भी मैं तुम्हे सोचता हूँ..
तो तुम मुझे दिखाई देती हो
उस प्यार भरे लम्हे की तरह
जिसे जीने की खातिर
यह उम्र भी कम पड़ जाए
स्वप्न की सीमा से परे॥
जब भी मैं तुम्हे सोचता हूँ॥
तो तुम मुझे दिखाई देती हों
मेरी जीवन की तपती भूमि पर
कुछ भीनी फुहारे बरसा कर
मेरी जीवन की मिटटी को
सोंधी कर देती हों ॥
यथार्थ की सीमा से परे
जब भी मैं तुम्हे सोचता हूँ॥
तो तुम मुझे दिखाई देती हों
आकर्षण से, विचारो से, सपनो से
बहुत कुछ करीब होता है ...
अगर कुछ नही होता है तो ...
वो तुम.....?
Sunday, March 23, 2008
Thursday, March 20, 2008
खुद को बाँट लिया है हमने

खुद को बाँट लिया है हमने कई हिस्सों में,
जिंदगी भी तो मिली है मुझे कई हिस्सों मे
जीने की तमन्ना, पाने की हसरत,
खो जाने का खौफ, ऐसे ही कई किस्सों मे
चाहकर भी जिसे भूल न पाए हम,
हो गया जुदा हमसे वो चंद लम्हों मे
दिल की तड़प कोई क्या जाने,
किस राह से गुज़रे हम इन रिश्तों मे
मांग बैठे थे खुदा से उसको कुछ इस तरह्,
देखा नहीं कुछ भी जमाने की रस्मों मे
मौसम कितने ही आए और गए,
फ़िर भी हम जीते रहे, मरते रहे ....
Wednesday, March 19, 2008
ये क्या है...?
उसके होने पर भी उसकी याद में बहते आंसू
उसके लफ़्ज़ों का मुझमें समा जाना
उसके जाने पर उसके प्यार का एहसास
उसकी मुझे पा लेने की वो बेचैनी
मेरी आत्मा की वो तड़प
बिछड़कर फिर मिलने की कशिश
मेरे सारे आंसू, मेरी मुस्कुराहट
मेरा चलना, मेरा रुकना
मेरी बातें, वो मेरी तन्हा रातें
वो कुछ पल का साथ हमारा
जीवन भर का रिश्ता
मेरे दिल की धड़कनों में
उसके प्यार की सांसें
आज फ़िर मैंने महसूस की
वही प्यार की काशिश
जबकि यह सम्भव नही
फ़िर ये क्या है...?
Tuesday, March 11, 2008
तेरे आने की उम्मीद

तेरे आने की उम्मीद
मेरी तन्हाइयों में,
जब भी ख्याल आता है, कि
इस जहां में अकेले है हम,
याद आता है तुम्हारा वो वादा,
जब तुमने कहा था कि
साथ हम रहेंगे सदा,
कहां गये वो वादे,
वो कसमें, वो इरादे,
जाने से पहले कम से कम
कह कर तो जाते,
क्या तुम्हे मालूम नहीं था
कि तुम्हारा रस्ता मैं कभी न रोकूंगा
क्या यही तुम्हारा यकीं था,
इसी भरोसे के दम पर,
हम साथ चले थे, एक दूजे का हाथ थाम कर
सोचता हूँ शायद वो दिन फिर से वापस आ जायें
इसी उम्मीद में जी रहा हूँ कि शायद तुम लौट आओ
क्या मेरी उम्मीद पुरी होगी.......????
कौन देगा जवाब....तुम या वो.......
Friday, March 7, 2008
कहां हो तुम
Thursday, March 6, 2008
बदलते दौर के रिश्ते

दोस्तो,
जीवन मे कई रिश्ते बनते- बिगडते, उलझते-सुलझते रहते हैं। पारिवारिक, कार्यक्षेत्र, दोस्ती और मानवीय संवेदनाओं के। हमारे समाज मे भी हर तरह के रिश्ते का अपना एक विशेष महत्व है. लेकिन अब धीरे-धीरे सब कुछ बदल रहा है
उड़ीसा के एक मेरे अजीज दोस्त की भावनाओ से आज रूबरू हुआ..उसकी बातो के कुछ अन्सो ने मुझे कुछ लिखने को मजबूर किया. मुझे लगता है की वो दोस्त भी कुछ रिश्तो की उलझन मे है, मुझे लगता है आज के बदलते दौर मे जिस रिश्ते मे सबसे ज्यादा बदलाव आया है वो सम्भवत: पति-पत्नी का है॥ समर्पण और त्याग की जगह अब दम्भ और स्वार्थ दिखाई देता है…लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है की सामाजिक रिश्ते की प्रतिबद्दाता होती है.. परेशानी तब उठती है जब रिश्तों के मूल मे प्रेम ही नही होता..जहा प्रेम ही नही, वहा रिश्तों का क्या मोल?? फ़िर ऐसे रिश्ते क्यो निभाए जाते है? ऐसे रिश्तों को तोड़ देना ......
रिश्तों की कैसी उलझन है,
शर्तों पर होते बन्धन हैं!
अब बन्ध जाने का मोह नही,
बस खुल जाने की तडपन है!!
आज जो दिल को प्यारा है,
कल बेकार बेचारा है,
कभी इस पर तो कभी दूजे पर,
घटती बढती अब धडकन है!
रिश्तों की कैसी उलझन है
शर्तों पर होते बन्धन हैं!
अब बन्ध जाने का मोह नही,
बस खुल जाने की तडपन है!!
आज जो दिल को प्यारा है,
कल बेकार बेचारा है,
कभी इस पर तो कभी दूजे पर,
घटती बढती अब धडकन है!
रिश्तों की कैसी उलझन है
इक जागे दूजा सो जाए,
ना पूछे कुछ, ना बतियाए,
दूजे की चिन्ता करे कौन!
पल- पल होती अब अनबन है!
...क्रमशः
Monday, March 3, 2008
सपने सच नहीं होते

मैंने कामना नहीं की
निरंतर सुख की
मैं जानता हूं
यह सहज नहीं
कल्पना की उड़ानें
नहीं भरी मैंने
क्योंकि यथार्थ यही है
की उड़ने के बाद भी
इसी जमीन पर उतरना है
मैंने कोई सपना नहीं देखा
क्योंकि सपने सच नहीं होते
वे तो अंधेरे के उस मोती के समान है
जो सुबह होते ही फूट जाते हैं...
यूं सपने में होना भी
सुख है.. मैं जानता हूं ...
क्या आप जानते है.....?
Saturday, February 23, 2008
रिश्ता तुम्हारा और मेरा
आज मैं वो करने जा रहा हूँ जो मेरे लिए सबसे मुश्किल था। वो है अपनी भावनाओं को शब्दों में ढालना। आज मैं अपने हर अहसास को चंद लफ्जो के जरिये तुम तक पहुँचाना चाहता हूँ।मुझे आज भी याद है, वो पहला दिन जब तुम मेरे पास आई थी। हाथों में खनकती चूड़ियाँ, माथे पर छोटी-सी बिंदी, कानों में इठलाती झुमकियाँ और होठों पर हलकी-सी मुस्कान, जैसे मेरे आस-पास का हर कण इनके मिश्रित प्रभाव से खिल उठा था।मैं नहीं जानता था वो एक पल मेरे मानसपटल पर इतनी गहरी छाप छोड़ जाएगा। वो एक पल मेरे जीवन के हरेक पल से जुड़ जाएगा, वो एक पल काफिला बनकर मेरे वजूद से गुजर जाएगा और मैं सिर्फ मैं नहीं रह जाऊंगा, तुम्हारा अस्तित्व मुझसे, मेरे जीवन से, मेरे हर पल से, मेरे दिन से, मेरी रातों से, मेरे होने से, मेरे न होने से, हर एक वस्तु से जो मुझसे जुड़ी है, इस तरह से जुड़ जाएगा कि मुझे उसमें खुद को ढूंढने में उम्र निकल जाएगी। मैं आज भी तुम्हारी एक झलक को अपनी आँखों में बसाकर पूरा दिन गुजार लेता हूं, अपनी रातों को समझाता रहता हूँ और सुबह फिर तुम्हारे दीदार का इंतजार करता रहता हूं। यदि इस तरह उम्र गुजर जाए तब भी रंज न होगा। इतने पर भी कभी तुम्हें स्पर्श करने को मन लालायित नहीं हुआ। लगता है तुम्हें छू लूंगा तो सपना टूट जाएगा। तुम्हारे देह की सुगंध ही मेरे चारों ओर इस तरह से बिखरी रहती है कि लगता है तुम यहीं कहीं हो मेरे बहुत करीब।मैं नहीं जानता तुम मुझे कितना जान पाई, तुम मेरे बारे में क्या सोचती हो। मैं तुमसे कुछ नहीं चाहता कुछ नहीं मांगता। प्रेम कुछ पाने का नाम नहीं। मेरे लिए प्रेम का अर्थ समर्पण। आज मैं तुमसे बिना कुछ मांगे अपना सब कुछ समर्पित करता हूँ। क्योंकि मेरे पास मेरा कुछ बचा ही नहीं। उस पर सिर्फ तुम्हारा अस्तित्व है। तुम को तुम्हारा ही सब कुछ दे रहा हूँ। जीवन में जितने पल बचे है सिर्फ तुम्हे महसूस करता रहूंगा। शायद ये मेरा प्रेम ही हैं।
Thursday, January 31, 2008
सखी कैसे मैं पंछी बन जाऊँ

सखी कैसे मैं पंछी बन जाऊँ
उड़कर तुमसे मिलने आऊँ
उड़कर तुमसे मिलने आऊँ
तुमने प्यार दिया है मुझको
कैसे मैं चुकता कर पाऊँ
कैसे मैं पंछी बन जाऊँ।
जोड़ा क्यों अनबूझ ये रिश्ता
कैसे मैं बन जाऊँ फरिश्ता
तुमसे बार-बार मिलने को कैसे
यह जीवन दुहराऊँ कैसे
मैं पंछी बन जाऊँ।
तुम हो जैसे श्वेत कबूतर
चंचल चतुर मुक्त औ आतुर
मैं बंधन में बँधा परिंदा
कैसे तुम जैसा बन जाऊँ
कैसे मैं पंछी बन जाऊँ।
चलो, भूल जाऊँ मैं तुमको
याद करो ना जो तुम मुझको
मन से निकली उन लहरों को
सखी कैसे मैं वापस कर पाऊँ
कैसे मैं पंछी बन जाऊँ।
सखी तुम कहा हो !
Tuesday, January 15, 2008
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं.....
प्यार किया नहीं जाता, बस हो जाता है। मशहूर शायर मिर्जा गालिब के शब्दों में, 'इश्क वो आतिश है गालिब, जो लगाए न लगे और बुझाए न बुझे' और जब इश्क हो ही गया है तो कब तक इसे छिपाकर रखा जा सकता है। कहते हैं कि प्यार तो प्यार करने वाले की आँखों से झलकता है। कहा भी गया है-'इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते' प्यार, इश्क और मोहब्बत महज शब्द नहीं हैं। इन शब्दों में निहित हैं कई अहसास और कई कड़वी-मीठी स्मृतियाँ। कई ऐसे अहसास जो कि कभी तो नयनों को सजल कर दें तो कभी होठों पर एक मुस्कुराहट तैर जाए। प्यार तो एक फूल के माफिक है, जिस तरह फूल अपनी खुशबू से पूरी बगिया को महका देता है, उसी तरह प्यार रूपी फूल भी अपनी स्मृति रूपी खुशबू से जीवन की बगिया को सुगंधित कर देता है। पहला प्यार तो पहली बारिश की तरह है। जिस तरह बारिश की बूंदें तपती धरती के कलेजे पर पड़कर शीतलता प्रदान करने के साथ-साथ अपनी सौंधी सुगंध से मानव मन को महका देती हैं। बिल्कुल उसी तरह पहले प्यार की मधुर स्मृतियाँ जब प्यार करने वालों के मन मस्तिष्क पर पड़ती हैं तो प्यार करने वालों के हृदय को हर्ष विभोर कर देती हैं।
जिंदगी के सफर में चलते-चलते नजरें मिलीं और हो गया प्यार। बस होना था सो हो गया। और प्यार के अथाह समंदर में तैरते, डूबते हुए कुछ ऐसे आनंदित पलों को महसूस भी कर लिया जो किसी भी अमूल्य निधि से बढ़कर हैं लेकिन जिस तरह एक सिक्के के दो पहलू होते हैं, उसी तरह प्यार के भी दो पहलू होते हैं। सुखद और दुखद। लेकिन यह क्या एक ही राह पर चलते-चलते पता नहीं क्या हुआ, किसने वफा निभाई और किसने की बेवफाई। शायद किसी ने न की हो पर, कुछ परिस्थितियाँ ही ऐसी बन आईं कि छूट गया हो एक-दूसरे का हाथ, एक-दूसरे का साथ। प्यार की राहों में उतरना तो बड़ा आसान है, परन्तु उन राहों पर निरंतर साथ चलते रहना बड़ा ही मुश्किल है गालिब कहते हैं, 'ये इश्क नहीं आसाँ, इतना समझ लीजै एक आग का दरिया है और डूबकर जाना है।' इसलिए बड़े खुशनसीब होते हैं वे लोग जिनका पहला प्यार ही उनके जीवन के सफर में हमसफर बनकर मंजिल तक साथ रहता है। कुछ लोगों का पहला प्यार बीच सफर में ही अपना दामन छुड़ाकर अपनी राह बदल लेता है और बदले में दे जाता है, चंद आँसू, मुट्ठीभर यादें और कुछ आहें।फिर जब प्यार जिंदगी को इस दोराहे पर लाकर खड़ा कर दे तो अच्छा हो कि उस सफर को उसी मोड़ पर छोड़, अपनी राह बदलकर अपनी मंजिल की तलाश कर ली जाए।'वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन,उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।'जो लोग अपने प्यार को पा लेते हैं वे तो ताउम्र ही ईश्वर का शुक्रिया अदा करते हैं, परन्तु वे लोग जो कि किसी कारणवश अपने प्यार को नहीं पा सके वे अक्सर ही खुद से, औरों से और ईश्वर से यही शिकायत करते हैं
:जुस्तजू जिसकी थी, उसको तो न पाया ........
यह शिकायत, यह शिकवा क्यों? यह दुनिया तो एक मेले के समान है और व्यक्ति उसमें घूमने या भटकने वाला प्राणी मात्र। ईश्वर हम सबका परमपिता परमात्मा है। जिस तरह एक बच्चा मेले में घूमते हुए हर उस खिलौने को लेने की जिद करता है, लालायित रहता है जो उसे पसंद आता है लेकिन एक पिता अपने बच्चे को वही खिलौना दिलाता है जो उसके लिए बना होता है और जो नुकसानदेह नहीं होता। ठीक उसी तरह व्यक्ति भी वही सब कुछ पाना चाहता है जो कि उसके मन को लुभाता है, परंतु ईश्वर उसे वही देता है जो उसने उसके लिए बनाया होता है।अंततः ईश्वर ने उन प्यार करने वालों को, शिकायत करने वालों को और सबको वही दिया जो कि उसने उनके लिए बनाया है। फिर कैसे गिले-शिकवे। जो मिल न सका या जिसे पा ही न सके, उसका गम मनाने से अच्छा हो जिसे पा लिया है, उसको पाने की खुशियां मनाई जाएं। वही आपका है जिसे ईश्वर ने आपके लिए बना दिया है। फिर ऐसा भी तो हो सकता है कि आपने ही गलत दिल के दरवाजे पर दस्तक दी हो और फिर
'कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलताकहीं जमीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता।'
Monday, January 7, 2008
मैं बात करना चाहता हूँ उस लड़की से
मैं बात करना चाहता हूँ उस लड़की से
जिसको तलाश है मेरी तरह उस सुख की
जो बना ही नहीं कभी
या जो शायद बाँट चुका है
हाँ उसके पास बैठ कर लम्हा दो लम्हा रो लेना चाहता हूँ
जो मेरे प्यार की तरह छत पर खड़ी रहती है
दो बूँद पानी से भीगने को उस बदल के नीचे
जो छण्ट चुका है
हमारे हिस्से का सारा सुख शायद बँट चुका है
मैं उस लड़की की तलाश में खो जाना चाहता हूँ
जो मेरी तरह ही समंदर के साहिल पर शाम-ओ-सहर
घूमती रहती है किसी नाम को खोजती हुई
रह रह कर सोचती हुई
रेत पर अंगुली से यहीं कहीं तो लिखा था उसने
मेरी तरह उसको भी मालूम नहीं की
वक़्त की लहरों से हरफ़ हरफ़ मिट चुका है
समंदर की हथेलियों में नांहा सा वो वजूद
कब का सिमट चुका है
हाँ मैं उस लड़की की तरह महसूस करना चाहता हूँ
आँखों मैं नामी
ज़िंदगी मैं कोई कमी
और समझ लेना चाहते हूँ अपनी उम्र का हिसाब
मैं कसम ले चुका हूँ और उसे भी कसम देना चाहता हूँ की
आवाज़ ना देगी उस पल को कभी
जो किसी और तरफ़ पलट चुका है
हमरी राह से हमारी दिशा से हट चुका है
मैं उस लड़की के क़रीब बैठ कर
कुछ देर सुस्तना चाहता हूँ
जो मेरी ही तरह थक चुकी है
Wednesday, January 2, 2008
तुम कहां चले?

सपनों की गली पार कर अब तुम कहां चले?
आंसू को तार-तार कर अब तुम कहां चले?
दिल को जला के यार ने काजल बना दिया,
आंखों में उसे सार कर अब तुम कहां चले?
तुमने किया था कौल - हम बैठेंगे उम्र भर,
पहला ही दांव हार कर अब तुम कहां चले?
कब से खड़े हैं द्वार पर दरपन लिए हुए,
आंचल जरा संवार कर अब तुम कहां चले?
कहते थे साथ जाएंगे दरिया के पार हम,
जल में हमें उतारकर अब तुम कहां चले?
महंफिल में सभी आ गए हैं गम लिए अपना,
सरगम जरा उभार कर अब तुम कहां चले?
Tuesday, January 1, 2008
प्यार और प्यार

प्यार को कभी भी किया नहीं जा सकता। प्यार तो अपने आप हो जाता है। दिन और रात... धरती और आसमान, एक दूसरे के बिना सब अधूरे हैं। सन -सन करती हवाएं, सुन्दर नजारे, फूलों की खुशबू ... सभी में छिपा होता है प्यार... कुछ तो प्यार में हारकर भी जीत जाते हैं, तो कुछ जीतकर भी अपना प्यार हार जाते हैं। प्यार एक ऐसा नशा है जिसमें जो डूबता है वो ही पार होता है। प्यार पर किसी का वश नहीं होता.... अगर आप भी प्यार महसूस करना चाहते हैं तो डूबिये किसी के प्यार में ... दुनिया की सबसे बड़ी नेमत है ढाई आखर का प्यार... जब आप भी किसी को चाहने लगते हैं तो उसके दूर होने पर भी आपको नजदीक होने का अहसास होने लगता है , हर चेहरे में आप उसका चेहरा ढूंढने की असफल कोशिश करते हैं, कोई पल ऐसा न गुजरता होगा जब उसका नाम आपके होठों पर न रहता हो ... यही तो होता है प्यार... सुन्दर, सुखद , निश्छल और पवित्र अहसास। पूरी दुनिया के सुख इस प्रेम में समाए हुए हैं। यह शब्द छोटा होते हुए भी सभी शब्दों में बड़ा महसूस होता है। केवल इतना सा अहसास मात्र ही आपको तरंगित कर देगा कि मैं उससे प्यार करता या करती हूं ...
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