Tuesday, April 29, 2008

...और मैंने नींद खरीदी


कल रात बर्दास्त नही हुआ

और.. मैंने नींद खरीदी

दाखिल हुआ बिस्तर

के पहलू मे......

मय के आगोश मे अपना

होश छोड़ कर

तार- तार कर दिया

अपना वजूद

जहा टिका रहता था

तेरा अक्स

आज सोच रहा हूँ

कल मैंने ऐसा क्यो किया ?

1 comment:

आशीष दाधीच said...

बहुत खूब. मुझे भी बताए यह नींद कहाँ बिकती हैं....