Saturday, May 3, 2008

बेबस परिंदा हूँ ....


जानता हूँ की मैं

पा नहीं सकता तुम्हें,

यहाँ तक की तुम्हें छू पाना भी

असंभव है मेरे लिए।

फिर भी तुम्हारा अस्तित्व रहने तक

यहीं बने रहना है मुझे

हल्की बारिश के बाद

नोकीले पत्ते के कोने पर

बूँद सी, दमक रही हो तुम

जैसे तुम भी हिस्सा हो,

एक मात्र उस चौन्धियाते सूरज का।

कई बार चाहा की छू लूं तुम्हें,

या चोंच में भर ज्यों-का-त्यों

तुम्हें घोंसले तक ले आऊं।

परन्तु, मैं तो उसी पत्ते की शाख पर

निश्छल बैठा एक बेबस परिंदा हूँ

बस, एकटक निहार भर सकता हूँ तुम्हें,

वो भी दूर से,

ज़रा भी तुम्हारी ओर बढा तो

मेरा अस्तित्व बिखेर कर रख देगा तुम्हें।

3 comments:

आशीष दाधीच said...

बहुत खूब .....
पता नहीं क्यूँ लगा की कोई मेरे खुद के लिए कह रहा हैं ..........
अपनी सी लगी यह कविता.......

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह भाई वाह
आपको बधाई

Monika (Manya) said...

very nice........ full of feels......